रचना चोरों की शामत

Wednesday, 13 July 2016

छा चवाँ माँ

चित्र से काव्य तक
तूँ मिलण आएँ न, हाणे छा चवाँ माँ। 
छा थियण वारो सुभाणे, छा चवाँ माँ।

छो पई रोएँ, पुछियो हुन रात मूँखाँ
प्यार माँ आले विहाणे, छा चवाँ माँ। 

दर्दु ई व्यो खुद रुसी, सरतिनि पुछयो पए
छो वतो वैरागु राणे, छा चवाँ माँ।  

चाह में घणि जी शहरि व्यो, हू उते अजु  
पेट लइ प्यो ख़ाक छाणे, छा चवाँ माँ।

बिज त पोखे सभु सुठा, पाले कया वण
फल बिगाड़या कहिड़े दाणे, छा चवाँ माँ।

बोल मिसिरी बाहिराँ, पर छा अंदर में
कल्पनाकरतारु जाणे, छा चवाँ माँ।

-कल्पना रामानी

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