रचना चोरों की शामत

Thursday, 12 May 2016

हलु त सजण

हलु त सण गदु, हलूँ उते, वरी आस जगी, मन में।  
जिते वजा, मोहन मुरली, राधा जे जीवन में।  

प्यारु दिसी राधा जो किशिन साँ, हू बि हुआ खुश थींदा
झुंड बाँस जा, भाकुर पाए, हिक बिए साँ मधुबन में।  

राधा खे हुई, मोहन खाँ वधि, धुनि मुरलीय जी, प्यारी
गाल्हि बुधाई, हुई इहा हर, वण-टिण मूँखे, कन में।  

धरम-करम, सिक-प्रेम जो जेको, गोविंद अर्थु बुधायो
दिसूँ पया था, उहा विरासत, गीता-ज्ञान-वचन में।  

गोकुल जा सभु ग्वाल, यमुन-जलु, वेगाणा हिनि,जु बी
राधा-मोहनु,जु बि वसे थो, वृन्दावन जे मन में।  

-कल्पना रामानी 

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