रचना चोरों की शामत

Sunday, 18 September 2016

लगनि प्रेम जा मेला

चित्र से काव्य तक
बुधाँ पई,जुकल्ह माण्हुनि में प्यारु न हूँदो आ
पर हिन चविणीअ जो कोई आधारु न हूँदो आ 

मूँ त दिठो भरपूर प्यार साँ हीय दुनिया आहे
प्रेम उहो कहिड़ो जिति खटपट, खारु न हूँदो आ

चाहे सुहिणो बागु हुजे, पर लगंदो हिकु झंगलु
नज़र अग्याँ जे दिलि-घुरंदड़ु दिलदारु न हूँदो आ

जिते वनि जा पेर घुमनि, हुति खुशी बि वासु कंदी
दिड़नि बिना वस्यलु कोई परिवारु न हूँदो आ

नि प्रेम जा मेला, त लगे हर दींहु दिणु जिंदुड़ी
मेल-जोल खाँ पावनु को त्यौहारु न हूँदो आ

जिते कल्पना सिक जो सूरजु,हिं न दे दर्शनु
उते रण लइ दियो बि को तैयारु न हूँदो आ 

-कल्पना रामानी

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